विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के नए क्षेत्रीय अध्यक्षों की अग्निपरीक्षा, सात महीने में दिखानी होगी संगठन की ताकत

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के नए क्षेत्रीय अध्यक्षों की अग्निपरीक्षा, सात महीने में दिखानी होगी संगठन की ताकत

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A litmus test awaits the BJP's new regional presidents ahead of the assembly elections

लखनऊ। A litmus test awaits the BJP's new regional presidents ahead of the assembly election,sभाजपा ने विधान सभा चुनाव से पहले क्षेत्रीय अध्यक्षों की नियुक्ति तो कर दी, लेकिन इससे चुनौतियां कम नहीं होने वाली। नए अध्यक्षों की चुनावों में कड़ी परीक्षा होगी। पिछली टीम में यानी 2023 में बने क्षेत्रीय अध्यक्षों का प्रदर्शन 2024 लोकसभा चुनाव में निराशाजनक रहा था, ऐसे में नए अध्यक्षों पर बेहतर प्रदर्शन का दबाव है। खासकर जब विधान सभा चुनाव में सिर्फ सात माह बचे हैं और अध्यक्षों के पास क्षेत्रों में दौरा करने का भी समय नहीं होगा।

चार और पांच जुलाई को राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने संगठन की जिला स्तर तक की इकाइयों को चुनावी लक्ष्य देकर उनकी चुनौती और बढ़ा दी है। भाजपा ने प्रदेश एवं जिला संगठन बनाने के लिए जातीय एवं सामाजिक समीकरणों में समन्वय साधने में लंबा वक्त लगाया। मोर्चो के चेहरों को लेकर भी कई चरणों में मंथन चला।

पहली बार संभालेंगे ये दायित्व 

पार्टी ने पिछले माह 25 जून को काशी, ब्रज, गोरखपुर, पश्चिम क्षेत्र, कानपुर एवं अवध क्षेत्र के अध्यक्षों की घोषणा की, जिसमें सब पहली बार इस दायित्व को संभालेंगे। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को तगड़ा झटका लगा। तत्कालीन क्षेत्रीय एवं जिलाध्यक्षों से रिपोर्ट मांगी गई। सबने हार के कारणों पर रिपोर्ट दी। यह बताया कि अंदरूनी कलह और कई विधायकों के असहयोग की वजह से पार्टी की सीटें घटकर लगभग आधी रह गईं।

हार के बाद कई सीटों से बगावत के सुर भी उभरे। पार्टी ने माना कि संविधान बदलने के नैरेटिव, वर्तमान सांसदों के प्रति विरोध, कार्यकर्ताओं की उदासीनता एवं सपा के पीडीए फैक्टर के असर से कमल मुरझाया। संगठन में भी कोई धार नहीं दिखाई पड़ी। अब नए क्षेत्रीय अध्यक्षों के सामने सात माह के दौरान दर्जनों जिलों में भ्रमण, अभियानों का संचालन, क्षेत्र एवं जिलों की टीमों का निर्माण, प्रवासियों का ध्यान एवं बड़े नेताओं की जनसभा कराना है। उन्हें बैठकों में बताया जा चुका है कि पिछले लोकसभा चुनाव में विधान सभा वार परिणाम देखें तो भाजपा बड़े अंतर से हारी है।

35 पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने पर फोकस

लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश संगठन ने दलितों को साधने के लिए गांवों में जनसंपर्क किया। हर विधान सभा सीट पर पांच हजार से ज्यादा मतदाता वाली 35 पिछड़ी जातियों को गोलबंद करने पर फोकस किया। जातीय आधार पर महापुरुषों का कैलेंडर बनवाया। सवर्ण वोटों की डोर को कसकर रखने का प्रयास किया। मनरेगा का नाम बदलकर विकसित भारत जी राम जी कर इसका बढ़ चढ़कर प्रचार किया।

महिला आरक्षण संशोधन विधेयक सदन में गिरने के बाद देशभर में प्रदर्शन किया। प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार एवं बाद में संगठन विस्तार में पीडीए का पूरा ध्यान रखा, लेकिन आने वाले दिनों में पार्टी के प्रयासों को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी क्षेत्रीय अध्यक्षों को उठाना होगा, जिसे बड़ी चुनौती माना जा रहा है।